21.01.2009 रात्रि : 13.30 बजे
प्रेमः ऐसे एक शब्द के सिवा कुछ भी नहीं चाहिए
वे नहीं जानते
या भूल गए हैं कि
भाषा के बीज
कहीं भी जनम सकते हैं
कहीं भी पनक सकते हैं
इस जमीन पर
या कि आकाश में .....
या कि पूरे ब्रहमाण्ड में
आसमान की क्या हद
वह तो स्वयं आस मान है ।
शायद छोटा है इसके लिए ।
इसलिए
जहां उसका जनम हुआ होगा
वह धरती कहलाई होगी
और आकाश या कि आसमान या कि
समुद्र या कि पूरी प्रकृति
निहारती भर रह गई होगी उसे विमुग्ध !
तब क्या ईश्वर ने
पैदा किए होंगे कुछ शब्द -
नहीं !
इसी धरती ने
धारण किया होगा
उर्जा की अजस्त्र धाराओं को
बूँद बूँद
अपनी कोख में
और वही बूँद
वीर्य कहलाया होगा
और ध्वनि का वही वही प्रस्फुटन
प्रकट हुआ होगा
प्रेम के संगोपन में
जिसे कहा ईश्वर ने -
मैंने स्वयं को सृजित किया -
कि मैं ही
वह ध्वनि हूँ
कि वह विरवा
कि पुकारो मुझे किसी भी शब्द से
किसी भी ध्वनि से
और हम लड़ रहे हैं
कि यह मेरी भाषा
कि वह तेरी भाषा
कि यह मेरा देश कि वह तेरा देश
कि यह मेरी धरती कि यह मेरा वेश
और इस तरह हमने अपने ही शब्द
अपने ही अर्थ
अपने खिलाफ खड़े कर लिए
और वे खड़े हैं लाम बंद हो
और हमें ही कत्ल कर रहे
दिन-रात
पल-क्षिण
और हम चिल्ला भी रहे
वह पाकिस्तान
वह हिन्दुस्तान
वह अमरीका
वह चीन
वह हमास
वाह क्या क्या नहीं हो रहा धमास !
पता नहीं
उस ध्वनि का प्रथम स्फोट
कब और कहाँ हुआ होगा
कौन बताएगा
धरती ने कब कोख में उसे धारण किया
कब उसे जाया
नहीं ज्ञात वह तारीख
समय या घड़ी
पर यह तय है कि
इन परिकल्पनाओं के समीप ही कहीं
किसी मुकाम पर
कि पहाड़ों या कन्दराओं में या कि
समतल पर या कहीं और -
जहाँ प्रकृति ने किया होगा
किन्हीं संगोपनों में स्वयं को अभिव्यक्त.....
जनम गयी होगी
शब्द की हस्ती.....
पर कहाँ !
कहाँ कहाँ..... की
वे पहली ध्वन्याकमताएँ
जहां निकली होंगी
या कि उसके इर्द-गिर्द....
या कि आदम और हौआ की पहली सीत्कार....
या कि हहराते समुद्र
की टूटन
या फटती ज्वालामुखियों का क्रन्दन
या कि
जब किया होगा कलरव पंछियों ने.....
तय है
ध्वनि की उस पहली ईकाई
ने जब लिया होगा जन्म
एक अप्रतिम रुप
लावण्य मुस्काया होगा
ईश्वर पहली बार अवतरित हुआ होगा
धरती पहली बार शर्माई होगी
वह पहली शाम
उद्दाम लहर ठहर गई होगी
और पूरी रात
और पूरी कायनात
स्तब्ध और निशब्द रही होगी
देख रही होगी
वह कसमसाहट
जन्मने की पीड़ा
की साक्षी उस रात के
गर्भ से निकल कर
कैसे आया होगा
एक नवारुण पृथ्वी पर
धपाक से
देखी होगी प्रकृति ने
वीर्य प्रस्फुटन के उस नव निनाद को
ईश्वर का
मौन पहली बार हुआ होगा मुखर ।
शब्द का जनम
दिन
पंचांग बन गया होगा ।
शब्द पनक गया ऐसे ही इस दुनियां में
वहां....
जहां से ऊपर....
किसी अनजानी धरती पर
वह पहली बार पनका
जहाँ
वह धरती बेहद नरम
और ऊर्वरा होगी ।
हां वह शब्द
किसी कारखाने
का उत्पाद नहीं है
बल्कि उन कारखानों की नींव में
श्रम और स्वेद की बूंदे हैं
कुर्सियों की बाहों
या मेज़ पर बिकती फाईलों में लिखे
हरफ !
जब बोलते हैं -
तब भी कोई भाषा जनमती है ।
भाषा
जंगल में जनम सकती है
वह होटलों में व्यभिचार के बीच
एक नई दुनियाँ में
एक नई दुनियाँ
रच सकती है
पर वह किसी किरोड़ीमल की तिजोरी में कैद
हो नहीं सकती
क्योंकि उसकी जड़ें
धरती की माटी में गड़ी होती हैं
वहां, वह हर संगोपन
एक ही ध्वनि में ऊजागर कर देती है ।
कोई विरवा
जब बियराड़ से छिटक कर
आरी पर गिर जाता है
वह चिरई–चुरुंग के पेट में जनमने लगता है
एक चिड़िया तब गुनगुना रही होती है ।
जब कोई चिड़िया
किसी मकान की दीवार पर
बैठ कर बिष्टा कर देती है
वहां भी एक अनपचा विरवा
एक पीपल का पेड़ रोप जाता है
जिसको डर से कोई काटता भी नहीं ।
वह मकान और पंछी की कहानी सुना रहा होता है ।
इलसलिए काटना मत किसी शब्द को,
वह कटा कि
फटा ।
इसलिए
किसी भी भाषा से
उसके शब्दों से
खिलवाड़ न करो
वे खिलवाड़ में भी
न जाने कब और कैसे
पूरी सत्ता को ही बदल देते हैं ।
वह
ऑस्कर का पुरस्कार ला सकते हैं
पर संभव है तुम्हारे ही मुँह पर
तमाचा भी ज़ड़ दें
इसलिए उनका इस्तेमाल ऐसा न करो
कि तुम्हें सफाई पर सफाई देनी पड़े ।
देखो
शब्द मयखाने में पैदा होते हैं
मधुशाला में पैदा होते हैं
मस्ती में पैदा होते हैं
शब्द आग हैं भाई
आग से न खेलो
यह खेल खेल में आग लगा देते हैं
महल को राख में तबदील कर देते हैं
सधवा को विधवा बना देते हैं
और बाहुबलि को
महाभारत में धकेल देते हैं ।
वह
आदमी की नस्ल और वस्ल
दोनों की शक्ल बदल देते हैं ।
शब्द
गोली बारुद आदि से भी
अधिक मारक होता हैं भाई !
न जाने कब अस्त्र – शस्त्र बन जाए
और घर और बाहर दोनों का एक बार में ही
ऩक्शा ही बदल दे ।
वह
कब चौसर पर बिछी बाजी में
अपने हीं भाँजे, बहु और भाईयों की
खुशहाल जिन्दगी को
महाभारत में बदल दें
नहीं मालूम ।
शब्द
जो पक जातें हैं
धनकती धूप में
उनकी आंखों में मत झांको
न जाने कब उसमें लाली बरने लगे ।
वे अंधेरों में
आदमी के हाथों में आ कर
खौलने लगते हैं
तुम उसे क्रान्ति कहो
लाल झण्डा
या पुकारो उसे
किसी नए नाम से
बिन लादीन
या आतंक
या जेहाद
बुश या प्रजातंत्र पर हमला
उसका अभिप्राय एक ही है
जीने का हक छीनना
जो गवारा नहीं है उसे ।
यही तो वह ताकत है
जिसने
दुनिया के
बेहद कमजोर आदमी गांधी को
दुनियाँ का सबसे मजबूत आदमी बना दिया
इतिहास न तो उसे सिवा
अपने पन्नों में कैद कर सका
ना ही दुनियाँ का सबसे बड़ा साम्राज्यवाद
उसे हरा सका
निहत्था था
पर कितना ताकतवर !
शब्द
भाषा के
मौन के अव्यक्त से
प्रस्फुटित हो
मुखर ध्वन्यात्मकता से
निःसृत हो
न जाने कितने
रौरव और हरकारों से निकल कर
बहती नदियों, समुद्र और पहाड़ों और
उनकी कन्दराओं, गुफाओं और घाटियों, पगडंडियों आदि को
पार कर
समतल में चहूँ ओर
अपनी जरुरत और सत्ता के अनुकूल
बनाते गए
घर और बस्तियां
उनके कुल और वंश पनपते रहे
बसता गया परिवार-दर-परिवार
और आज हम
सोचते हैं
हम किस परिवार के हैं ।
क्या हमारी भाषा अपनी है या पराई !
यों जैसे
एक बार में सारी धरती पर
हम
कई सुरों में बजना चाहते हैं
पर एक दूसरे को
अपना नहीं मानते ?
शब्द सब
ध्वन्यायित हो
अभिव्यक्ति के संसाधन बने
एक एक कर
सब की सत्ता कायम हुई
हमने अपने अनुकूल
उनमें से कुछ को चुना
और बतियाने लगे
उनके सहारे
एक-दूसरे से
और जब-जब बतियाते
पाया कि
जब भी किसी संकल्पना को
नई रुपाकृति में ढ़ालने की चाहत हुई
अभिव्यक्ति तलाशने लगी
एक नया पर अपना सा शब्द
नए रुप के लिए
नई शैली के लिए
और जो भी आया
नजदीक मिला
भले ही हम उसे कहें
परदेशी
उससे
उसका अपनापे वाला
शब्द ले लिया ।
शब्द
सबद हो गया
और गांधी
अहिंसक !
शब्द
मेरी भाषा में
आज के अख़बार में
रोज पढ़ाता है वही एक शब्द
और हम बार-बार उसे भूल जाते हैं
स्मरण नहीं कर पाते
क्योंकि उसे अपनी सत्ता पर नाज़ है
और शब्द को वह अपने मसरफ़ से इस्तेमाल करना चाहता है
मेरी भाषा
एक नया शब्द
उस दिन से
जब लाठी
चार्ज हो गया
और डंडा महिलाओं के जिस्म को
उघाड़ कर
घिनौनी हरकते करने लगा
और लाठी का नाम डंडा पड़ गया
और वह
शांति के विरुद्ध
चार्ज़ हो गया
लाठी की शक्ल बदल गई
और भाषा में लाठी डंडा बन बरस गई ।
शहर परेशान होता है जब
हर नया शब्द
उसे, नई दवा ला कर
दे देता है
रोग से मुक्त होने के लिए।
भाई लड़ना ही है
तो लड़ो उससे
जो शब्दों की उर्जा को तोड़ना चाहते हैं
नष्ट उन्हें करो जो
शब्दों को समझना नहीं चाहते
बे-वज़ह अपनी ही किसी भाषा को न गरियाओ
अपना मुँह खराब करने से
क्या फायदा ?
खुद का ज़ायका बिगड़ता है !
भाई
अपने ही भाई से
रह-रह क्यों लड़ते हो
अपनी बहनों से लड़ना क्या
क्या जीतना है वह !
दोनों के जिस्म
और जहांन में
एक ही शब्द
लाल लाल
प्रवाहित होता है
दिल पर कान रखो
और सुनो तो ज़रा
कि अपने प्रवाह में
वह कह क्या रहा !
न जाने क्यों ऐसा लगता है
हम अपनी ही भाषा का प्रयोग
अपने खिलाफ कर रहे हैं
और मशगूल हैं
कि कोई आए मेरे दरवाज़े
और कहे-
वाह ! क्या दमदार शब्द का इस्तेमाल किया है ?
आज तक यह विवाद हो रहा
कि इस लकीर के पार जो शब्द है
वह तेरा है
और इस पार वाला मेरा है
या कि एक दिमागी भ्रम
कि मेरा तेरे में है
और तेरा मेरे में घुसा है !
पर किसी को पता नहीं
किसका किसमें कितना है !
आग जब लगती है
शब्द जब जलते हैं
उसके भड़क कर दूर के घर तक
लहाफ मार जला देने का भय
पूरी आबादी को डरा देता है
और दुःस्वप्न साकार हो जाता है कई बार ।
इसलिए ज़रुरी है कि
अब भी समझो कि
शब्द
एक
आग है
और
आग की
एक ही भाषा होती है
बरना लहकना और बुझ जाना
वह
जब
सब कुछ को
आगोश में ले लेती है
तब
शांति
स्वतः आती है
पर
तब वह शांति भी पीड़दायक होती है
इसलिए
प्यार करो
शब्द से
हर शब्द से
अपने या उनके या कि पूरी दुनियां के शब्दों से
प्रेम
ढ़ाई आखर ही सही
पर
सबसे अधिक मुखर
सबसे अधिक प्यारा है
एक
शब्द ।
आओ, इधर सरक कर
बैठो पास पास
और इबादत करें
हर शब्द के जनम–दिन पर
उसके बड़े होने और दुनिय़ां में बढ़ने पर
कि आओ और स्वीकार करें
शब्द को कोई हथियार मार नहीं सकता
कसाब की क्या बिसात गिलानी
बिन लादिन की सत्ता तो बिल्कुल बेमानी !
दुनिया गवाह है
कोई भी
कितना भी ताकतवर क्यों न हुआ
भारत की धरती पर
वह हार कर ही
गया
और जब भी गया
यहां के शब्द
उसके जीवन का
औलिया बन गए
और ऐसे ही कई इबादतगाहें बन गईं
और आज भी वह
समझ नहीं पा रहे कि
क्या ले जाएं यहां से और क्या पाएं
पर
दोस्त
एक नसीहत दे रहा हूँ तुम्हें यहाँ -
मेरी कविता में
वह
शब्द
कभी भी मरता नहीं
वह सर्वदा अजेय है
और इसलिए यहां हर जाति और धर्म आदि
गेय है ।
इसलिए
चाहो तो इतना करो –
शब्द की छांव में आ जाओ
नफ़रत को प्रेम का शब्द सुनाओ
मन के धागे में ऐसी मनका लगाओ
कि दुनियाँ के हर कोने में तुम्हारी फिरनी फिरे
और एक साथ
प्रेम की तरंग में
ऐसे एक शब्द के सिवा
मुझे या तुम्हें कुछ भी अधिक नहीं दिखे
या मिले ।
रचयिता :
उदय कुमार सिंह
गेल कॉलनी, मगदल्ला ।
Nice
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