माँ
माँ
तब मेरा जनम भी न हुआ होगा,
था,
कि तुम्हारी शादी में
देख सका होऊंगा...
कि तुम्हारी शादी में
देख सका होऊंगा...
तुम्हारी रंग-रंगाई मांग को
और कह सका होऊंगा .....
कि माँ -
तुम बहुत अच्छी लग रही हो मुझे !
माँ !
आज मैंने अपने अभिन्न मित्र ‘सुलभ’ से पूछा है
कि दोस्त मेरी ‘माँ’ हंसती नहीं है कभी भी !
कि क्या हो गई है बात भाई !!
कि क्या बात है भाई !!!
माँ
वह कह रहा था, कि
देख भाई
समाज उसे विधवा कहता है
जिसकी माँग में सिंदूर नहीं होता
उसे सधवा कहता है जिसकी माँग में सिंदूर लगा होता है
और उसे क्वांरी कहता है जिसकी माँग में सिंदूर नहीं लगा होता !
मां
तब मैं तुरत लौट आया था अपने दोस्त के पास से
और आते ही तुमसे पूछा था, कि
माँ ! ओ माँ !!
तुम सधवा हो, या कि
तुम विधवा हो, या कि
तुम क्वांरी हो माँ !!!
बताओ ना मुझे -
तुम्हारी माँग में होली के लाल अबीर सी
वह ललाई क्यूं नहीं दिखती माँ !
माँ, बताओ ना कि
तुम्हारी माँग उजली क्यूं है ?
और जभी तेरे हाथ
मेरी कनपट्टियों पर पड़े थे -
जोर से…..
जोर से…..
ज्यों लम्बे अर्से से मारा नहीं था तुमने -
और रो पड़ी थीं फूट-फूट कर
पर क्षण में खींच भी लिया था तुमने
मुझे
और रो पड़ी थीं फूट-फूट कर
पर क्षण में खींच भी लिया था तुमने
मुझे
अपनी गोद में
और खींच कर
और दोनों हाथों से पकड़ कर
चूम-चूम
सिसक सिसक
यह कहा था -
कि देख बेटे
और दोनों हाथों से पकड़ कर
चूम-चूम
सिसक सिसक
यह कहा था -
कि देख बेटे
तुमने सवाल किया है
मेरी माँग को उजली देख कर
तो सुन,
तो सुन,
एक दिन दिखाऊंगी
तेरी शादी में
तेरी इन ऊंगलियों को
अपनी बहू की माँग तक ले जा कर -
और बताऊंगी तुम्हें तब
कि ऐसी ही माँग थी मेरी....
कि देख -
ऐसी ही माँग थी मेरी
कि ऐसी ही माँग थी मेरी....
कि देख -
ऐसी ही माँग थी मेरी
और वही
तेरे सवाल का उत्तर होगा बेटे !
तेरे सवाल का उत्तर होगा बेटे !
वही ........ तेरे सवाल का......... उत्तर होगा ...... बेटे..
वही तेरे सवाल का उत्तर...........!
वही तेरे सवाल का उत्तर...........!
रचयिता :
उदय कुमार सिंह
सीबीडी, बेलापुर, नवी मुम्बई ।
“माँ” मेरी जिंदगी की वह हक़ीकत हैं जिन्होंने मुझे इस मुकाम तक पहुंचने के रास्ते बताए हैं – चाहे वह मेरे साथ रहीं हों या ना भी रही हों । उन्होंने मुझे प्यार कम पर दुत्तकार बहुत दिए हैं । उनकी नसीहतों ने मेरे हृदय में असीम प्रेम का ज़ज़्बा भरा है और मुझे कविता के नज़दीक तक पहुँचने का मार्ग प्रशस्त किया है । मैं उनका ऋणी हूँ कि उनके तिरस्कारों ने मुझे आदमी बने रहने की तमीज़ सिखाई है और उनके प्रति सदा अपने स्व को विलीन कर संयत बने रहने का पाठ पढ़ाया है । मैं सदैव उनके ममत्व के लिए लालायित रहा हूँ और यह इसलिए हुआ है कि मुझे उनसे बेईन्तहां प्रेम है चाहे उन्होंने मुझे मारा–पीटा हो या छिछन – बिछन कर गरियाया हो, या जैसा वह चाहीं - वैसा मैं, बन ना सका ! पर जो कुछ बना, और जिस रुप में हूँ जिन्दा, वह, उन्हीं का दाय है । माँ, मेरी जिंदगी का सपना रही हैं और उस सपने को मैंने अपने अन्तर-मन में सदैव संजो कर रखा है । मेरी कविताओं में कहीं-न-कहीं ही वह हर बार नज़र आएंगी क्योंकि माँ से बड़ी दुनियां में मेरे लिए कोई प्यारी मूरत नहीं – शायद ईश्वर भी नहीं । मेरे दावे को कोई झुठलाना चाहे तो ऐसा वह नहीं कर सकता क्योंकि उनके बिना मेरी इयत्ता कुछ हो ही नहीं सकती ।
कोई हकीकत तलाशने चले तो उसे शायद मेरी भाषा में विरोधाभास नज़र आए । पर इतना अवश्य कहूंगा कि यदि विरोधाभास भी नज़र आए तो उसे कबूल कर लेना क्योंकि वही तो मुक्त होने का मार्ग भी बनता है । माँ के प्रेम के लिए कौन संतान लालायित नहीं रहता ! भले वह उतना मिले या ना मिले – जितने की उसे चाहत हो । पर मैं उतना भी पा कर खुश हूँ जितना भर वह मुझे दे सकीं क्योंकि जो ना मिला उसके लिए मैं सदैव तत्पर तो बना रहा और वह मेरे सांसों का अंग रहीं कि वह अब प्यार करेंगी और तब प्यार करेंगी । आप कह सकते हैं – यह मोह है पर मैं, उसे मोह से मुक्ति की ओर प्रस्थान मानूंगा, और वह तभी संभव है, जब आप उसके प्रति अनासक्त रह कर उसकी अभिलाषा करें । मेरी भाषा की जीवंतता का वह एक सम्यक कारण हैं, और इसलिए मैं, उनका सदैव ऋणी हूं । माँ – आपके ममत्व के लिए मेरी यह कविता आपको सम्पूर्ण सम्मान के साथ समर्पित है ।
आपका बेटा – उदय कुमार सिंह,
पता: 8 सी 2, गेलआशियाना, सीबीडी बेलापुर,
नवी मुम्बई – 400614.
यह कविता “माँ”, मेरी संवेदना की वह पहली पौध है जिसे मैंने अपने बचपन में तब अपनी सांसों पर रोप लिया था जब मेरी धड़कनों की गति का मुझे कुछ भी अता-पता नहीं था और तब मैं एक कच्ची उम्र में था । पता नहीं किस ज़मीन पर यह पौध रुप गई औचक - शायद वह बेहद ही नाज़ुक ज़मीन रही होगी - जहां कादो-माटी के सिवा मेरा अपना कोई नहीं था, सिवा मेरी इन संवेदनाओं के, जो मेरी कविता में “माँ” की शक्ल में रुपाकृत हो गई और जिसने मेरी ज़िदगी को, लू भरे दौर से निकाल कर, अनजाने उन रास्तों पर ला छोड़ा जिस पर मैं निकल तो गया अपने घर के सारे मोह और बंधनों को छोड़ कर, किन्तु, फिर अपने घर आज तक लौट ना सका और माँ का वह प्यार भी ना मिला जिसे मैं चाहता रहा ता जिंदगी पाना, और शायद मेरे भाग्य में वह बदा नहीं पाना - ठीक वैसे ही जैसे पिता का बचपन में ही साथ छूट जाना और उनके प्यार से बंचित हो जाना । फिर माँ से भी उनका वह प्यार, आज भी और अब तक उनके जीवित रहने पर ना मिलना ! जिसकी जरुरत एक बच्चे को सदैव होती है - चाहे वह अपनी माँ के सामने वृद्ध ही क्यों न हो जाए और इस एक कमी का अहसास तो सदैव बना रहा है मेरे साथ - मेरे बचपन से आज तक - मैं इसे अस्वीकार नहीं सकता पर यही मेरी रिक्ति मेरी कविता की ताकत भी बनी है । यह एक वज़ह है जो मेरी कविता में एक मक़सद के रुप में अन्तरायित है । बात-चीत के लहज़े में वह कविता में नज़र आ ही जाएगी - कहीं-न-कहीं । बचपन से ही, ऐसे ही सोच से जूझता, कुछ-कुछ, यदा-कदा, लिखता रहा और उस शुरुआत की, यह प्रस्थानिका, मेरी बेतरतीब जिंदगी, एक भाषा पाती गई और उसने, मेरी आवाज को, जीवन के सारे दर्द को, रात के सन्नाटों में न जाने किन कांटों के सहारे बुनकर, मेरी उस दौर की मूक ध्वनियों को "माँ" की कविता में ढाल गई । वह सातवें दशक में मेरे जीवन के ऊथल-पुथल भरे जीवन की प्रारम्भिका रही हैं । यह कविता मेरी बेहद प्रिय कविता है जिसे मैं मौत के दस्तक तक नहीं भूल सकता । माँ मेरी अभी जीवित हैं पर मेरा उनसे कहने भर के संबंधों का ही संबंध रह गया है । वह मेरे पास नहीं रहतीं, मुझसे कभी प्यार से आज भी बातें नहीं करतीं, और ना जाने क्यों जब मैं उनसे मिलने की ललक से उनके पास जाता हूँ अपने गृह नगर तो थोड़े ही दिनों में मैं व्यथित मन से अपनी नौकरी करने के शहर में वापस लौट आता हूँ । वैचारिक स्तर पर हम कभी भी एक नहीं हो सके । ना कभी वह मुझे समझ सकीं और ना ही मैं उन्हें समझ सका । यहां मैं हार गया पर फिर भी मेरे अन्तर्मन में उनके लिए अथाह प्रेम है । मैं सदैव चाहता रहा कि वह खुश रहें किन्तु मैं उन्हें खुश रख नहीं सका ! यह एक अजीबोगरीब संत्रास है - मेरी जिंदगी का, और इसे मैं ता जिंदगी झेलता रहा । जाने क्यों ऐसा लगता है कि सब कुछ पा जाने के बाद भी मैं अतृप्त ही रहा ! शायद रिक्त रहा ! यह रिक्तता ही जिंदगी के भराव का मानक है - संभव है । इसलिए उनका उपकृत तो रहना ही होगा न मुझे !
मैं इसलिए भी उनका ऋणी हूं कि उन्होंने मुझे अपने जीवन में सांसारिक मोह से विरक्त रहने का कारण इस तरह से मुझे अपने से दूर कर के बताया । पर मेरी सांसों में उनकी इयत्ता तो मौजूद है और शायद इसलिए मैं उनसे तिरस्कृत हो हो कर भी जीवित बचा रह रहा हूँ । अतः मैं उनका जन्म- जन्मान्तर ऋणि रहूँगा - वह मानें या ना मानें ।
- उदय कुमार सिंह । 29.11.2011, नवी मुम्बई ।